गुरु गोविंद सिंह जी को सिखों के 10 गुरुओं में से दसवीं पदवी प्राप्त है। गुरु गोविंद सिंह जी के जीवन में अनेकों कठिनाइयों आई जिनका अनुसरण यदि कोई व्यक्ति करें तो उसे अपने जीवन की कई कठिनाइयों से निपटाने का तरीका समझ में आ जाए। गुरु गोविंद सिंह जी की मृत्यु 7 अक्टूबर, सन् 1708 में (उम्र 42 वर्ष ) नांदेड़, महाराष्ट्र, भारत में हुई थी।

गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म पौष महीने की शुक्ल पक्ष की सप्तमी की 1666 में बिहार के पटना शहर में हुआ था. साल 2024 में 17 जनवरी, बुधवार के दिन गुरू गोबिंद सिंह जी की जयंती को मनाया जाएगा।
गुरु गोविंद सिंह जी की मृत्यु कैसे हुई थी जाने पूरी कहानी :-
गुरु गोविंद सिंह जी की मृत्यु के संबंध में अलग-अलग लोगों से अलग-अलग बातें सुनी जाती हैं किंतु सुनी गई बातों के अनुसार जो कि हमें जन सामान्य से प्राप्त हुई है ऐसा बताया जाता है कि उनके मृत्यु का समय गुरु गोविंद सिंह जी को अपनी मृत्यु से पहले ही पता चल गया था।
कैसे हुई थी गुरु गोविंद जी की मृत्यु
गुरु गोविंद सिंह जी एक बहुत ही धीरे-धीरे निर्भीक योद्धा थे जो किसी परिचय के मोहताज नहीं है। बहुत समय पहले की बात है जब गुरु गोविंद सिंह जी सन 1707 में बहादुर शाह नामक एक राजा से मिले जो की मुगलो का आठवां सम्राट था। गुरु गोविंद सिंह सन 1707 में बहादुर शाह से आगरा में मिले जहां पर उन्होंने बहादुर शाह को पुनः शासन प्राप्त करने में मदद की जिससे बहादुर शाह और गुरु गोविंद सिंह जी की दोस्ती और गहरी होती चली गई।

गुरु गोविंद सिंह जी के एक शिष्य द्वारा यह पूछने पर की गुरुजी आप हमें बताइए कि आपने बहादुर शाह की सम्राट बनने में सहायता क्यों की तो गुरु जी ने अपने शिष्य को बहादुर शाह की सहायता करने का कारण बताते हुए कहा की पिछले जन्म में बहादुर शाह “श्री गुरु ग्रंथ साहिब” जी से तहे दिल से यही मांगता था की है गुरु मुझे अगले जन्म में सम्राट ही बनाना इसलिए मैंने बहादुर शाह की सम्राट बनने में सहायता की।

गुरु गोविंद सिंह और बहादुर शाह जो की मुगल सम्राट थे बढ़ती दोस्ती और अच्छे संबंधों को देखते हुए वजीर खान जोकि सरहद का नवाब था को गुरु गोविंद सिंह जी से ईर्ष्या होने लगे वह गुरु गोविंद सिंह जी से इतनी हीन भावना रखने लगा कि उसने गुरु गोविंद सिंह जी के पीछे दो पठान लगा दिए जिन्होंने समय पाकर चुपके से गुरु गोविंद सिंह जी के छाती में खंजर मार दिया।

पठानों द्वारा धोखे से किए गए इस खंजर के वार से गुरु गोविंद सिंह जी बुरी तरह घायल हो गए। इस गांव को भरने के लिए 10 से 12 वैद्य दिन रात एक करके गुरु जी की सेवा में लग रहे जिससे महीना बाद यह घाव कुछ भरने की हालत में आ पाया की तभी विदेश से आए कुछ विदेशी मेहमान गुरुजी से भेंट करने व उनका स्वास्थ्य का हाल लेने आए जब वे वापस अपने देश जा रहे थे तब गुरु जी ने उन्हें दो धनुष उपहार स्वरूप प्रदान किया किंतु समस्या उन विदेशी मेहमानों के समक्ष यह आ रही थी कि उन्होंने आज तक जितने भी धनुष चलाएं उनसे गुरुजी के द्वारा दिया गया धनुष चल पानी में बहुत कठिनता हो रही थी वह इस धनुष को ठीक से नहीं चला पा रहे थे जिसके कारण गुरु जी ने उन्हें धनुष चलाने की शिक्षा प्रदान करनी चाही।

गुरु गोविंद सिंह जी ने उन विदेशी मेहमानों से अगले दिन आने की बात कही इसके बाद जब वह विदेशी मेहमान अगले दिन गुरु जी से धनुष चलाने की विद्या सीखने आए तब जैसे ही गुरु गोविंद सिंह जी ने धनुष पर बाढ़ चढ़ाया उनका वह भरता हुआ घाव फिर से हरा हो गया जिसके कारण उसे गांव में से बेहद खून बहने लगा जिसको रोकना असंभव सा होने लगा।

जिसके बाद गुरु गोविंद सिंह जी को वैद्यों द्वारा फिर से उपचार करने की प्रक्रिया को शुरू किया गया गुरु जी का यह घाव भरने में ही नहीं आ रहा था इसके कुछ समय बाद ही गुरु गोविंद सिंह जी को ज्ञात हो गया था कि अब उनकी मृत्यु का समय निकट है स्वर्ग में बैठे उनके पिता उनको बुला रहे हैं।
गुरु गोविंद सिंह जी एक दानवीर, कर्मवीर, धर्मात्मा पुरुष थे। उनके पास जब भी कोई व्यक्ति पहुंचता उनसे कुछ भी मांगता यदि उसे चीज को किसी भी प्रकार से आए व्यक्ति को उसे वस्तु को प्रदान करने में सक्षम होते थे तो भी उसे वह वस्तु प्रदान करने में कभी भी पीछे न हटते थे।

गुरु गोविंद सिंह जी को खंजर लगने के बाद जब वह गंभीर रूप से जख्मी हो गए तथा जब धनुष पर बाढ़ चढ़ाते समय उनके घाव फिर से हरा हो गया तब गुरु गोविंद सिंह जी को ज्ञात हो गया कि अब उनकी मृत्यु का समय आ चुका है इसके बाद उन्होंने अपने शिष्यों को आदेश दिया कि अब उनकी चिता को सजाया जाए शिष्यों ने गुरु जी की आज्ञा का पालन करते हुए गुरु जी की चिता को सजाया गुरु गोविंद सिंह जी की जीत झोपड़ी नुमा आकार में सजाई गई।
गुरु गोविंद सिंह जी की जब चिता सज गई तब वे अपने नीले घोड़े और बाज जिन्हें वे सदैव अपने साथ रहते रखते थे के साथ आए और उसे जलती हुई चिता में अपने घोड़े और बाज के साथ “वाहेगुरु जी दा खालसा वाहेगुरु जी दी फतेह” का जाप करते-करते उस जलती हुई चिता की लपटों में समा गए। गुरु जी ने अपनी मृत्यु से पहले अपने सभी शिष्यों और अनुयायियों को श्री गुरु ग्रंथ साहिब की आराधना करने और उसका पालन करने वासुदेव सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने को कहा।

7 अक्टूबर, सन् 1708 में (उम्र 42 वर्ष ) नांदेड़, महाराष्ट्र, यही वह दिन था जिस दिन गुरु गोविंद सिंह जी दिव्य ज्योति में विलीन हो गए। गुरु गोविंद सिंह जी जिस दिन दिव्या ज्योति में प्लेन हुए वह जी चिता में विलीन हुए उसे दिन एक बहुत ही आश्चर्य की घटना घटित हुई क्योंकि किसी भी व्यक्ति द्वारा पांच तत्व में विलीन होने के बाद उस चीता की शांत अग्नि में कुछ अवशेष बाकी रह जाते हैं जिन्हें की बाद में देख लिया जाता है किंतु गुरु जी जब दिव्या ज्योति में क्लीन हुए तो उसे चिता के शांत होने के बाद वहां पर कोई भी अवशेष प्राप्त न हो सका वह जगह ऐसी थी कि मानो यहां कुछ हुआ ही ना हो।
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